Wednesday, December 13, 2006

निराले रंग

एकटक, निरंतर, संस्पर्श
अनुभूत    हूँ,
और हैं---
बोझिल कोमल नयनों में 
निखरते  सपनों के निराले रंग I 

तभी --
नीरस कर्कश गूँज कोई 
बेवजह हिलोरें लगाती है 
टूटता है सन्नाटा
झीनी झल्लाहट से 
फूटती है कान की सूखी परतें 
और फिर---
बिखर जाता है रंग 
खो जाता है धुन्ध्लाहट से I I 


संभालना अपने को,
इतना आंसा तो नहीं, 
काश- इतना तो होता
डूबता अपनी ताल में बेताल 
और ये हिलोरें--
चुस्कियों की तरह
आती जाती रह जाती
और हमेशा होता -

वही ---
बोझिल कोमल नयनों में 
निखरते सपनों के निराले रंग ...
रंग ..
निखरते सपनों के निराले रंग ...
रंग ....रंग .....रंग .. रंग I I I 

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