Thursday, August 15, 2013

तुम आओ ना

मेरी निगाहों को, अब और, तुम तरसाओ ना,
करीब मेरे, फिर कब आओगी, तुम बताओ ना !

फासला ज्यादा नहीं,  बस मीलों की दूरियां है,
अपनों के शहर में बैठ यूँ,  तुम इतराओ ना !

रोज़ के अफ़सानों से, वाकिफ हो गए तो क्या,
बेवजह बहाना,  आज कोई, तुम बनाओ ना !

बीते पहर का शुमार,  कहो-- अब समझा मैंने,
ईद बीता, इन्तजार मुहर्रम का, तुम कराओ ना !

फलक भी सूना पड़ा है,  तेरे आने के आस में,
सितारों की वो लंबी बातें फिर, तुम सुनाओ ना !

करवटों की कशिश से, आँखें सूजी, गर्दन टेढ़ी,
अपने आगोश में, नींद मेरी, तुम महकाओ ना !

पल का सफ़र संग मुमकिन हो, यही सोचता हूँ,
जहन मेरा, उल्फत में तेरे,  तुम चहकाओ ना !

ख़ामोशी में धीमी साँसों की भी आवाज़ होती है,
हाथ पकड़, आहिस्ते- आहिस्ते, तुम गुनगुनाओ ना !

सावन में तो केवल शायर ही तनहा झूमता है,
शाम शमां की,  रौशनी से,  तुम सजाओ ना !

मेरे पेहलू का साया, कभी छोड़, तुम जाओ ना,
करीब मेरे, फिर, तुम आओ ना, तुम आओ ना !!!

------------कौशल किशोर विद्यार्थी 

2 comments:

Chayanika said...

Bahut khub! "Aaj fir dil udas hai, na vo aaya na aane ki aas hai..."

vibhuti bhushan sharma said...

Sir, I mm very fond off of poetry..
I am an Advocate in Rajasthan High Court Jaipur. Ex President Rajasthan High Court Bar Association Jaipur.